| توقف فإن العلم ذاك الذي يجري |
| 1 |
|
توقف |
فإن |
العلم |
ذاك |
الذي |
يجري |
|
    ***     |
|
وتعلمْ |
بأنَّ |
الحكمَ |
منا |
ولا |
تدري |
|
| 2 |
|
    ***     |
|
كذا |
قرّر |
الله |
المهيمن |
في |
صَدري |
|
| 3 |
|
أنا |
في |
عباد |
الله |
روح |
مقدّس |
|
    ***     |
|
كمثل |
الليالي |
روحها |
ليلة |
القدر |
|
| 4 |
|
    ***     |
|
غريبٌ |
بما |
عندي |
عن |
الشفعِ |
والوتر |
|
| 5 |
|
ولما |
أتاني |
الحقُّ |
ليلاً |
مبشّراً |
|
    ***     |
|
بأني |
ختام |
الأمر |
في |
غرَّة |
الشهر |
|
| 6 |
|
وقال |
لمنْ |
قدْ |
كانَ |
في |
الوقتِ |
حاضراً |
|
    ***     |
|
منَ |
الملإِ |
الأعلى |
ومنْ |
عالمِ |
الأمرِ |
|
| 7 |
|
ألا |
فانظروا |
فيه |
فإنّ |
علامتي |
|
    ***     |
|
على |
ختمهِ |
في |
موضعِ |
الضربِ |
في |
الظهرِ |
|
| 8 |
|
وأخفيتهُ |
عن |
أعينِ |
الخلقِ |
رحمة |
ً |
|
    ***     |
|
بهم |
للذي |
يعطى |
الجحود |
من |
الكفر |
|
| 9 |
|
عرضتُ |
عليهِ |
الملكَ |
عرضاً |
محققاً |
|
    ***     |
|
فقالَ |
ليَ |
الأمرُ |
المعظمُ |
في |
السترِ |
|
| 10 |
|
لأنكَ |
غيبٌ |
والسعيدُ |
من |
اقتدى |
|
    ***     |
|
بسيدِهِ |
في |
حالة |
ِ |
العسرِ |
واليسرِ |
|
| 11 |
|
فنحمدُ |
في |
السراءِ |
حمداً |
مخصصاً |
|
    ***     |
|
ونحمد |
حمداً |
سارياً |
حالة |
الضرّ |
|
| 12 |
|
ظهوركَ |
في |
الأخرى |
فثمَّ |
ظهورنا |
لذا |
|
    ***     |
|
جئتني |
في |
العربِ |
إذْ |
جئتَب |
بالشكرِ |
|
| 13 |
|
فإنَّ |
وجود |
الشكرِ |
يبغي |
زيادة |
|
    ***     |
|
من |
الله |
في |
النعماء |
فانهض |
على |
اثري |
|
| 14 |
|
لو |
أنك |
يا |
مسكين |
تعرف |
سرَّه |
|
    ***     |
|
لكنت |
بما |
تدري |
به |
أوحد |
العصر |
|
| 15 |
|
غريباً |
وحيداً |
حائراً |
ومحيراً |
|
    ***     |
|
وكنتَ |
على |
علمٍ |
تصانُ |
عنِ |
الذكرِ |
|
| 16 |
|
خفيٌّ |
على |
الألبابِ |
منْ |
أجلِ |
فكرها |
|
    ***     |
|
وإن |
كان |
أعلى |
في |
الوضوحِ |
من |
البدر |
|
| 17 |
|
أنا |
وارثٌ |
لا |
شكَّ |
علمَ |
محمدٍ |
|
    ***     |
|
وما |
الفخر |
إلا |
في |
الجسومِ |
وكونها |
|
| 18 |
|
ولستُ |
بمعصومٍ |
ولكنَّ |
شهودَنا |
|
    ***     |
|
هو |
العصمة |
الغرَّاء |
في |
الأنجمِ |
الزهر |
|
| 19 |
|
ولستُ |
بمخلوقٍ |
لعصمة |
ِ |
خالقي |
|
    ***     |
|
منَ |
الناسِ |
فيما |
شاءَ |
منهُ |
على |
غمرِ |
|
| 20 |
|
علمت |
الذي |
قلنا |
ببلدة |
تونس |
|
    ***     |
|
| 21 |
|
أتاني |
بهِ |
في |
عامِ |
تسعينَ |
شربنا |
|
    ***     |
|
بمنزلِ |
تقديسٍ |
منَ |
الوهمِ |
والفكرِ |
|
| 22 |
|
ولمْ |
أدرِ |
أني |
خاتمٌ |
ومعينٌ |
|
    ***     |
|
إلى |
أربعٍ |
منها |
بفاسٍ |
وفي |
بدرِ |
|
| 23 |
|
أقامَ |
لي |
الحقُّ |
المبينُ |
يمينهُ |
|
    ***     |
|
بركبتهِ |
والساقُ |
منْ |
حضرة |
ِ |
الأمرِ |
|
| 24 |
|
    ***     |
|
وكانَ |
معي |
قومٌ |
وليسوا |
على |
ذكري |
|
| 25 |
|
وأَقسمَ |
بالحجرِ |
المعظمِ |
قدرهُ |
|
    ***     |
|
وفي |
ذلكَ |
الإيلاء |
يمينٌ |
لذي |
حجرِ |
|
| 26 |
|
مولدة |
الأرواح |
ناهيك |
من |
فخر |
|
    ***     |
|
لقد |
جاء |
بالميراثِ |
في |
طيء |
نشري |
|
| 27 |
|
وأينَ |
بلالٌ |
منْ |
أبي |
طالبٍ |
لقدْ |
|
    ***     |
|
تشرفَ |
بالتقوى |
المحقرُ |
في |
القدرِ |
|
| 28 |
|
سألتكَ |
ربي |
أنْ |
تجودَ |
لعبدكمْ |
|
    ***     |
|
بأنْ |
يكُ |
مستوراً |
إلى |
آخرِ |
الدهرِ |
|
| 29 |
|
كمثل |
ابن |
جعدون |
وقد |
كان |
سيِّداً |
|
    ***     |
|
إماماً |
فلم |
يبرح |
من |
الله |
في |
ستر |
|
| 30 |
|
سألتكَ |
ربي |
عصمة |
َ |
السترِ |
إنهُ |
|
    ***     |
|
على |
سنة |
الحناوي |
سنتنا |
تجري |
|
| 31 |
|
لقدْ |
عاينتْ |
عيني |
رجالاً |
تبرزوا |
|
    ***     |
|
خضامة |
ً |
علياً |
وما |
عندهمُ |
سري |
|
| 32 |
|
وأقسمتُ |
بالشمسِ |
المنيرة |
ِ |
والضحى |
|
    ***     |
|
وزمزم |
والأركانِ |
والبيتِ |
والحجر |
|
| 33 |
|
لئن |
كان |
عبدُ |
الله |
يملك |
أمره |
|
    ***     |
|
فما |
مثلهُ |
عبدُ |
السميع |
أو |
البرِّ |
|
| 34 |
|
فإنَّ |
لكلِّ |
اسم |
تعيَّن |
ذكرُه |
|
    ***     |
|
سوى |
الذات |
مدلولاً |
له |
حكمة |
الظهر |
|
| 35 |
|
فمنْ |
يشتهي |
الياقوتَ |
منْ |
كسبِ |
كدِّهِ |
|
    ***     |
|
يقاسي |
الذي |
يلقاه |
من |
غمة |
البحر |
|
| 36 |
|
وإن |
ذكروا |
روحي |
حننت |
إلى |
مصر |
|
    ***     |
|
أتاني |
بهِ |
الفاروقُ |
عندَ |
أبي |
بكرِ |
|
| 37 |
|
فلم |
أستطع |
عني |
دفاعاً |
ولم |
أكن |
|
    ***     |
|
بما |
جاءني |
فيهِ |
مبشرهُ |
أدري |
|
| 38 |
|
    ***     |
|
بحضرة |
ِ |
عبد |
الله |
ذي |
النائلِ |
الغمرِ |
|
| 39 |
|
وما |
زلت |
من |
وقتِ |
الغروبِ |
بمشهد |
|
    ***     |
|
فملت |
إليه |
في |
رجالٍ |
ذوي |
نهى |
|
| 40 |
|
ومصباحُ |
مشكاة |
ِ |
المشيئة |
ِ |
في |
يدي |
|
    ***     |
|
أنوّر |
بيت |
الله |
عن |
وارد |
الأمر |
|
| 41 |
|
لأسرحَ |
منهُ |
والصلاة |
ُ |
تلزني |
|
    ***     |
|
على |
ما |
أراه |
ما |
يزيد |
على |
العشر |
|
| 42 |
|
لباسي |
الذي |
قد |
كان |
في |
اللون |
أخضرا |
|
    ***     |
|
وإني |
منْ |
ذاكَ |
اللباسِ |
لفي |
أمرِ |
|
| 43 |
|
غنيتُ |
بتصديقي |
رسالة |
َ |
أحمدٍ |
|
    ***     |
|
عنِ |
الكشفِ |
والذوقِ |
والمحققِ |
والخبرِ |
|
| 44 |
|
وهذا |
عزيز |
في |
الوجودِ |
مناله |
|
    ***     |
|
ولوْ |
لمْ |
يكنْ |
هذا |
لأصبحتُ |
في |
خسرِ |
|
| 45 |
|
ولي |
في |
كتاب |
الله |
من |
كل |
سورة |
|
    ***     |
|
نصيبٌ |
وجلُّ |
الخيرِ |
منْ |
سورة |
ِ |
العصرِ |
|
| 46 |
|
تواصوا |
بحقِّ |
اللهِ |
في |
كلِّ |
حالة |
ٍ |
|
    ***     |
|
كما |
أنهم |
أيضاً |
تواصوا |
على |
الصبر |
|
| 47 |
|
أحبُّ |
بقائي |
ها |
هنا |
لزيادة |
ٍ |
|
    ***     |
|
وأفزع |
إيماناً |
إلى |
سورة |
النصر |
|
| 48 |
|
إذا |
لم |
أكن |
موسى |
وعيسى |
ومثلهم |
|
    ***     |
|
فلست |
أبالي |
أنني |
جامع |
الأمر |
|
| 49 |
|
    ***     |
|
ختامُ |
اختصاص |
في |
البداوة |
ِ |
والحضر |
|
| 50 |
|
شهدتُ |
له |
بالملك |
قبلَ |
وجودِنا |
|
    ***     |
|
شهودَ |
اختصاصٍ |
أعقلُ |
الآن |
كونهُ |
|
| 51 |
|
ولم |
أك |
في |
حال |
الشهادة |
في |
ذعر |
|
    ***     |
|
لقدْ |
كنتُ |
مبسوطاً |
طليقاً |
مسرحاً |
|
| 52 |
|
ولم |
أك |
كالمحبوس |
في |
قبضة |
الأسر |
|
    ***     |
|
ظهرتُ |
إلى |
ذاتي |
بذاتي |
فلمْ |
أجدْ |
|
| 53 |
|
سواي |
فقال |
الكل |
أنت |
ولا |
تدري |
|
    ***     |
|
فإن |
أشركت |
نفسي |
فلم |
يك |
غيرها |
|
| 54 |
|
وإنْ |
وحدتْ |
كانت |
على |
مركبٍ |
وعر |
|
    ***     |
|
إذا |
قلتُ |
بالتوحيد |
فاعلم |
طريقه |
|
| 55 |
|
فما |
ثمَّ |
توحيدٌ |
سوى |
واحدِ |
الكثرِ |
|
    ***     |
|
ولا |
بد |
أن |
تمتازَ |
فالوتر |
حاصلٌ |
|
| 56 |
|
ولكن |
في |
الايجاد |
لا |
بد |
من |
نزر |
|
    ***     |
|
لقد |
حارتِ |
الحيراتُ |
في |
كلِّ |
حائرٍ |
|
| 57 |
|
وحاصلُ |
هذا |
الأمرِ |
في |
القولِ |
بالنكرِ |
|
    ***     |
|
فإنْ |
شهدتْ |
ألفاظنا |
بوجودِنا |
|
| 58 |
|
تقولُ |
المعاني |
إنني |
منكَ |
في |
خسرِ |
|
    ***     |
|
إذا |
ذكروا |
جسمي |
حننتُ |
لشامِنا |
|
| 59 |
|
وإنْ |
ذكروا |
روحي |
حننتُ |
من |
فخرِ |
|
    ***     |
|
ألا |
إن |
طيب |
الفرع |
من |
طيب |
أصله |
|
| 60 |
|
وكيفَ |
يطيبُ |
الفرعُ |
من |
خبثِ |
النجرِ |
|
    ***     |
|
يعزُّ |
علينا |
أنْ |
تردَّ |
سيوفنا |
|
| 61 |
|
مفللة |
ً |
من |
ضربِ |
هام |
ومن |
كسر |
|
    ***     |
|
صريراً |
من |
أقلامٍ |
سمعتُ |
أصمني |
|
| 62 |
|
وما |
علمتْ |
نفسي |
بصمٍّ |
منَ |
الصرِّ |
|
    ***     |
|
حياة |
فؤادي |
من |
علومِ |
طبيعتي |
|
| 63 |
|
كإحياء |
ماء |
قد |
تفجر |
من |
صخر |
|
    ***     |
|
بلاداً |
مواتاً |
لا |
نبات |
بأرضها |
|
| 64 |
|
فأضحتْ |
لمحياها |
تبسمُ |
بالزهرِ |
|
    ***     |
|
تتيهُ |
بهَ |
عجباً |
وزهواً |
ونحوهُ |
|
| 65 |
|
حدائقَ |
أزهارٍ |
معطرة |
ِ |
النشرِ |
|
    ***     |
|
نراها |
مع |
الأرواح |
تثنى |
غصونها |
|
| 66 |
|
حنواً |
على |
العشاقِ |
دائمة |
َ |
البشرِ |
|
    ***     |
|
فيا |
حسنه |
علماً |
يقوم |
بذاتنا |
|
| 67 |
|
جمعنا |
بهِ |
بينَ |
الذراعِ |
معَ |
الشبرِ |
|
    ***     |
|
وما |
بينَ |
سعيِ |
الساعِ |
والباعِ |
والذي |
|
| 68 |
|
يهرول |
بالتقسيم |
فيه |
وبالشبر |
|
    ***     |
|
فيحظى |
بمجلاه |
وبالصورة |
التي |
|
| 69 |
|
لها |
سورة |
ٌ |
فوقَ |
الطبيعة |
ِ |
والفقرِ |
|
    ***     |
|
سريتُ |
إليهِ |
صحبة |
َ |
الروحِ |
قاصداً |
|
| 70 |
|
إلى |
بيتهِ |
المعمورِ |
في |
رفرفِ |
الدرِّ |
|
    ***     |
|
فكن |
في |
عداد |
القوم |
واصحب |
خيارهم |
|
| 71 |
|
ولا |
تكُ |
في |
قومٍ |
أسافلة |
ٍ |
غمرِ |
|
    ***     |
|
ولا |
تتركنهم |
وانظر |
الحق |
فيهمُ |
|
| 72 |
|
ولا |
تتخذ |
نجماً |
دليلاً |
عليهمُ |
|
    ***     |
|
فسكناهمُ |
المعروفُ |
بالبلدِ |
القفرِ |
|
| 73 |
|
وعاشر |
إذا |
عاشرت |
قوماً |
تبرقعوا |
|
    ***     |
|
أشدّاء |
مأمونين |
من |
عالم |
القهر |
|
| 74 |
|
علومُ |
عبادِ |
اللهِ |
في |
كلِّ |
موقفٍ |
|
    ***     |
|
وغير |
عباد |
الله |
في |
موقف |
النشر |
|
| 75 |
|
ترى |
عابدَ |
الرحمنِ |
في |
كلِّ |
حالة |
ٍ |
|
    ***     |
|
تميل |
به |
الأرواح |
كالغصن |
النضر |
|
| 76 |
|
بقاء |
وجودي |
في |
الوجود |
منعماً |
|
    ***     |
|
بما |
أنعمَ |
اللهُ |
عليَّ |
منَ |
السحرِ |
|
| 77 |
|
يسوق |
لي |
الأرواح |
من |
كل |
جانب |
|
    ***     |
|
فما |
معجراتٌ |
بالخيالِ |
ولا |
السحرِ |
|
| 78 |
|
كما |
جاد |
لي |
بالحل |
من |
كل |
حرمة |
|
    ***     |
|
صبيحة |
َ |
يومِ |
الرميِ |
منْ |
ليلة |
ِ |
النحرِ |
|
| 79 |
|